अंतहीन चाहतों के समुंदर में , ये ज़िंदगी बैठी है ना खुलके हँसती है , ना जीती है सबकुछ के अंदर खुद को अधूरा पाती है अनगिनत चाहतों के दल - दल में फँसी हुई ये ज़िंदगी , कमियों और खामियों की लंबी सूची बाँधने चली है (1) “ ये ऐसा होना था , नहीं हुआ ” “ मुझे वो नहीं मिला ” और “ मिला भी तो क्या मिला ” “ और उसने ऐसा बोल्दिया " तो फिर " और किसीने कुछ ना बोला ” ऐसे ऐसे ना जाने कितने फरियादों को लेके बैठी है ...
राह चलते कोई मुसाफ़िर अपनो से ज़्यादा अपना लगता है कुछ नहीं तो दो कदम साथ तो चलता है अपने तो ऐसे ही मुंह फेर लेते हैं. जब अपने मुकर जातें हैं और कोई अनजाना सा आप के पास आप के साथ खड़ा होता है शायद उसीको लोग फ़रिश्ता कहते हैं. भगवान को मंदिर में ढूँडने से कहाँ मिलते हैं अपने ही आस पास ढुंडलो या खुद ही की अंदर में झांकलो वोही कोने में भगवान भी है और हैवान भी.
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